क्यों रोई थी मासी



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mahenag8

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क्यों रोई थी मासी
तीस जनवरी को बैठा था अपने कक्ष में ,
अचानक यह ख्याल आया,
साइरन नहीं बजा अबके ।
फिर सोचा साइरन तो बजा होगा शायद ,
मैं ही कहीं खोया था।
याद आया बचपन का वह दिन ,
स्कूल मेँ टीचर ने ग्यारह बजे साईरन सुन
मौन हमें रखवाया था ।
उस दिन हत्यारे ने बापू को हमसे छीना था
यह हमें बतलाया था ।
घर पर मम्मी ने हमको बतलाया
दुखद खबर जब यह आयी थी , उनकी एक मासी बहुत रोई थी ।
कोई समझ न पा रहा था, घर मेँ सब मंगल है
फिर क्यों रो रही है मासी ?
अपने चारों ओर देखता हूं ,मचा है कैसा यह हाहाकार ,
भीड़ द्वारा मारे जा रहे निर्दोष संत और सन्यासी ,
करके लाठी डंडों से निर्मम प्रहार ।
आपस मेँ लड़ा रहे हमें धर्म के ये ठेकेदार
हत्यारे महिमा -मंडित हो रहे
अबलाएं कर रहीं चीतकार।
अपनी झोली भरने मेँ लगे सभी, निर्धन की कौन सुने पुकार।
तीली सुलगा रहे मुर्ख, पडोसी का घर जलाने को,
होके बारूद के ढेर पर सवार ।
फैल गया है विष यह हम सब के दिलों का चहों ओर बन कर भयंकर महामारी ।
मानव जाति का अस्तित्व बचाने क्या आसकेगा फिर से कोई गांधी ?
क्या आएगा हाड मांस का वह पुतला निर्मल बनाने फिर से हमारे जीवन को,
हाथ मेँ चरखा लेकर पाठ सादगी का हमें याद दिलाने को
सत्य अहिंसा का मार्ग दिखाकर करेगा लामबंध हमें ,
हारने हमारे अपने भीतर के शत्रु को ।
विडम्बना है कि हत्यारे ने तो मारा था सिर्फ एक बार उस गाँधी को ।
रोज रोज हम कितनी ही बार शहर शहर गलियों गलियों कूचों में ,
मार रहे हम विश्व प्रिय अपने उस गाँधी को ।
आज समझ में आ रहा था कुछ कुछ
क्यों रोई थी मासी उस दिन ,
क्यों रोई थी मासी।
-महेश नागर 'नटवर '-

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