हीरा चुनने भेजा था तुझे



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mahenag8

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हीरा चुनने भेजा था तुझे,
तू व्यर्थ के कंकर बीन कर ले आया।
दिव्य ख़ज़ानों से ओतप्रोत ,
मनोरम इस उपवन में ,
यह कैसा तू खो गया ?
काया-माया के कुचक्र में फंसकर ,
तू यह कैसा मोहित हो गया ?
उजाड़ दिया तूने यह उपवन ,
स्वयं हो विस्मृत ।
बना पायेगा अजर अमर
नश्वर इस देह को ,
क्या कोई तेरा 'अमृत'?
ज्ञान गंगा प्रवाहित थी तेरे भीतर ,
देह प्रेम की लालसा में ,
यह कैसा तू रम गया ?
अपने व्यर्थ के ज्ञान का दम्भ भरकर ,
तू कैसा मूरख हो गया ?
प्रलोभनों के पीछे दौड़ा,
क्षण भर भी आनंदित न हो पाया।
कैद होकर अपनी ही मायानगरी में ,
दुखी होकर तू बैठ गया।
आत्मविलोकन का समय है यह ,
क्यों तू मुझे भूल गया ?
हीरा चुनने भेजा था तू
कंकर बीन कर क्यों लाया ?
-महेश नागर 'नटवर '

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