देखता हूं



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annuyadav

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 मै उगते हुए सूरज मे भी अंधेरी रात देखता हूं,

शीशे में खड़े इंसान को कुछ परेशान देखता हूं।

सोचता हूं कि मुझे मुझ से बेहतर कोई नही समझता,

पर अगले हि पल, खुद को खुद से अंजान‌ देखता हूं।

मै शीशे में खड़े इंसान को परेशान देखता हूं।


कभी आजाद पंछी की तरह,

आसमान में उड़ने की ख्वाहिश रखता था,

आज जमीन से भी रिश्ता तोडते,

अपने डगमगाते पांव देखता हूं।

मानो पंख ही कट गए हो,

मेरे ख्वाबों के,

जिम्मेदारियों के बोझ तले डूबती,

अपने सपनों की नाव देखता हूं।

मै शीशे में खड़े इंसान को परेशान देखता हूं।


शायद खुद से ही हार मान ली है मैंने,

गौर फ़रमाया तो आज भी,

खुद को उतना ही पृतिभावान देखता हूं।

अपने अंदर का वो जुनून देखकर,

मै शीशे में खड़े इंसान को,

कुछ हैरान देखता हूं।

और आज फिर से अपने दिल में,

वही पहले जैसा जोश और जान देखकर,

मै महीनों बाद शीशे में खड़े इंसान के चेहरे पर,

वो अनोखी मुस्कान देखता हूं।


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COMMENTS


  1. Superb


  2. Superb 🎉


  3. Superb 🎉🎉❤️


  4. Deep


  5. rahulyadav805966Feb. 3, 2021, 2:33 p.m.

    Super


  6. gv.internationalschoolmaroutFeb. 3, 2021, 12:02 p.m.

    mindblowing


  7. dalbiryadav51273Jan. 11, 2021, 4:47 p.m.

    Epic!


  8. 💙💙